आखिर क्या है पारसमणी पत्थर का रहस्य

पारसमणी की कहानी 2वीं शताब्दी के आसपास शुरू होती है. ऐतिहासिक कहानियों को मानें तो उस समय के राजा तिमनपाल के पास एक जादुई पत्थर था, जिसे पारसमणी कहा जाता है.

News18Hindi
Updated: August 24, 2018, 7:01 PM IST
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आधी हकीकत-आधा फसाना में आज आपके सामने होगी पारसमणी की कहानी. जी हां, वही पारसमणी जिसके बारे में कहा जाता है कि वह ऐसा पत्थर है, जो लोहे को सोना बना सकती है. बेशक सुनने में तो ये कहानी हकीकत कम फ़साना ज्यादा लगती है. लेकिन देश में एक ऐसी जगह है, जहां पारस पत्थर के ज़िंदा होने के दावा किया जाता है.

पौराणिक कहानियों के अनुसार एक बार देवताओं और असुरों के बीच समुद्र मंथन हुआ. जिसमें 14 रत्न निकले. इनमें विष और अमृत के साथ लाखों बेशकीमती मणियां भी निकलीं. उन्हीं मणियों में पारस पत्थर भी था, जो लोहे को सोना बना देती थी. आधी हकीकत-आधा फसाना में आज उसी पारस पत्थर की है. ये कहानी देश के दो ऐतिहासिक किलों की है, जहां पारस पत्थर के होने का आखिरी ज़िक्र मिलता है. बताते हैं कि उस किले के आसपास लोगों को आज भी सोना मिल जाता है. न्यूज 18 की टीम ने उस किले पर आधुनिक मशीनें आजमाईं, तो कदम-कदम पर सोने के हैरतअंगेज़ इशारे मिले.

इसी पारसमणी पत्थर का रहस्य जानने के लिए न्यूज 18 की टीम पहुंची राजस्थान के एक सदियों पुराने किले की पड़ताल करने. इस पड़ताल में टीम के साथ इंजीनियर्स की एक टीम और कुछ आधुनिक मशीनें भी थीं. ऐसा इसलिए क्योंकि उस किले के आसपास रहने वाले लोग बता रहे थे कि उस किले में राह-चलते किसी को भी सोना मिल जाता है. जब टीम ने किले की एक बावड़ी में वैज्ञानिक मशीनों को आजमाया, तो वाकई कुछ हैरतअंगेज़ इशारे मिले, लेकिन यह कहानी यहीं खत्म नहीं हुई. टीम ने थोड़ी और पड़ताल की तो कुछ लोगों ने बताया कि ये सब कुछ एक पारस पत्थर की करिश्मा है.

टीम के सदस्यों ने ऐतिहासिक कहानियों को पढ़ा तो पाया कि पारस पत्थर का आखिरी ज़िक्र राजस्थान की ही एक रियासत में हुआ है. इतना सब कुछ जानने के बाद अब बारी उस चमत्कारी पत्थर को तलाशने की थी और तफ्तीश के बाद जो कुछ टीम के सदस्यों ने देखा, वो किसी को भी हैरत में डाल सकता है. ये राजस्थान की एक पुरानी रियासत का शाहाबाद किला है. लोगों ने न्यूज 18 की टीम को बताया कि यहां की मिट्टी आज भी सोना उगलती है. यहां हुई खुदाई और मशीनों के इशारे ने वैज्ञानिकों के भी होश उड़ा दिए. लेकिन इस वैज्ञानिक पड़ताल के नतीजे देखने से पहले, उस राज़ को समझना जरूरी है, जो सदियों से यहां की मिट्टी में दफ्न है. मसलन इस किले में सोने का खज़ाना है, तो वह सोना कहां से आया. क्या ये सब कुछ किसी जादुई पत्थर का करिश्मा था.

इस कहानी का पिछला सिरा मिला राजस्थान की एक और रियासत से. जहां तिमनगढ़ का क़िला है. 11वीं शताब्दी की एक ऐसी सल्तनत, जो बार-बार लुटी और बार-बार बसी. इसकी वजह किला नहीं था, वज़ह था वो पारस पत्थर जो इस किले के राजा के पास था. इस किले का रिश्ता है यदुवंशी राजाओं से है. इतिहास के पन्नों में भगवान कृष्ण के वंशजों और पारस पत्थर का आखिरी ज़िक्र इसी किले में मिलता है. पारसमणी की कहानी 2वीं शताब्दी के आसपास शुरू होती है. जब इस किले में राजा तिमनपाल का राज हुआ करता था. ऐतिहासिक कहानियों को मानें तो राजा तिमनपाल के पास एक जादुई पत्थर था.

यह पत्थर लोहे को सोने में बदल देता था. इन कहानियों को साबित करता है इस रियासत का इतिहास, जो कहता है कि यहां के राजा जनता से कर के रुप में पैसे नहीं, बल्कि पुराना लोहा वसूलते थे. शायद इसलिए ताकि पारस पत्थर के जरिए लोहे को सोने में बदला जाता हो. लोगों का कहना है कि यहां का खजाना बहुत भारी है क्योंकि यहां का राजा पुराने लोहे को कर के रुप में लेता था और उससे सोना बताना था. इसलिए विदेशी शासकों की निगाहें टिकी हुई थीं कि यहां भारी मात्रा में सोना है.

न्यूज 18 की टीम ने इन कहानियों को सुनने के बाद तिमनगढ़ के बारे में थोड़ी और जानकारी जुटाई. लोगों से पूछताछ करने पर पता चला कि अफ़गानी शासक मोहम्मद ग़ोरी ने भी तिमनगढ़ किले पर हमला किया था. लोग बताते हैं कि वो हमला भी पारस पत्थर की ख्वाहिश में हुआ था. इतिहासकार मानते हैं कि मोहम्मद ग़ोरी के तिमनगढ़ आने की सबसे बड़ी वज़ह थी वो पारस पत्थर और सोना बनाने का वो फॉर्मूला, जो राजा तिमनपाल के पास मौजूद था.
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क्या वाकई शाहाबाद किले में मौजूद है पारसमणी...
क्या उस मणि का चमत्कार आज भी कायम है...
जानिए अगले अंक में...
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