क्या वाकई पारसमणी से कई मूर्तियों को सोने का बनाया गया था?

पारसमणी को तलाशने के लिए तीमनगढ़ सरोवर में हाथियों को चलवाया गया, लेकिन मणी हाथ नहीं लगी. हालांकि जब हाथी सरोवर से बाहर आए तो उनकी लोहे की चेन सोने में बदल चुकी थी.

News18Hindi
Updated: August 25, 2018, 7:12 AM IST
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आधी हकीकत-आधा फसाना के दूसरे अंक में हम जानेंगे पारसमणी पत्थर के उन रहस्यों को, जिसे दुनिया आज के पहले तक नहीं जानती थी. कहते हैं जब मोहम्मद गौरी ने किले पर हमला किया, तो पारस पत्थर को बचाना सबसे बड़ी चुनौती थी. दुश्मनों से बचाने के लिए राजा तिमनपाल ने पारस पत्थर अपने पुरोहित को दे दिया, लेकिन पुरोहित ने पारसमणि को कोई मामूली पत्थर समझकर किले के पास बने एक सरोवर में फेंक दिया. लोगों का कहना है कि तिमनगढ़ किले के पास वाली उस झील में पारस पत्थर आज भी छिपा पड़ा है.

तिमनगढ़ से जुड़ी जो सबसे चर्चित कहानी यह है कि राजा ने अपने पुरोहित को पारस पत्थर दिया और पुरोहित ने उसे पत्थर समझकर सरोवर में फेंक दिया. कहते हैं कि पत्थर को तलाशने के लिए इस सरोवर में हाथियों को चलवाया गया, लेकिन जब हाथी बाहर आए तो हाथियों की लोहे की चेन सोने में बदल चुकी थी. यानी वो पारस पत्थऱ उसी सरोवर में था लेकिन आजतक किसी को मिला नहीं. इन कहानियों को सुनने के बाद टीम ये जानना चाहती थी कि आखिर राजा तिमनपाल के पास वो पारस पत्थर आया कहां से.

पौराणिक और ऐतिहासिक किस्सों को खंगालने पर पता चला कि पारसमणि शेषनाग के पास थी. यानी भगवान विष्णु के पास. ये सिर्फ हिंदू मान्यताएं नहीं हैं, बल्कि बौद्ध और जैन धर्म में भी पारसमणि का ज़िक्र हुआ है. कई जगहों पर इसे चिंतामणि भी कहा गया है, जिसका सबसे बड़ा सबूत है तिब्बत का झंडा, जिसमें पारस पत्थर को एक चमकदार धातु की तरह पेश किया गया है. पारस पत्थर से जुड़ी एक और कहानी है कि प्राचीन भारत के महान रसायन शास्त्री नागार्जुन ने एक ऐसी तकनीक विकसित की थी, जिससे धातु को सोने में बदला जा सकता था और आगे जाकर उनकी इसी तकनीक को पारस पत्थर का नाम दिया गया.

वैसे ये कहानियां तिमनगढ़ के हालातों से मेल भी खाती हैं. पता चला कि राजा तिमनपाल ने इस किले में हर उस धर्म से जुड़ी मूर्तियां रखी थीं. जिनमें पारस पत्थर को एक सच माना गया है. ज्यादातर मूर्तियां सोने की थीं, जिन्हें पारस पत्थर के करिश्मे से तैयार किया गया था. अब सोने की मूर्तियां तो गायब हैं, लेकिन उन कहानियों के निशान आज भी बाकी हैं.

खजाने की तलाश में तीमनगढ़ किले में चारों तरफ खुदाई के निशान हैं. टीम को किले के पिछले हिस्से में खुदाई के सबसे ज्यादा निशान दिखाई दिए. टीम को जानकारी मिली कि कुछ वक्त पहले कुछ प्रशासनिक अधिकारियों ने इस किले का दौरा किया था. शायद उन लोगों ने मशीनों को आजमाया भी होगा, इसलिए टीम सीधे पहुंची करौली के कलेक्टर के पास. लेकिन वहां पता चला कि कलेक्टर को पारस पत्थर की कहानी पर ज़रा भी यक़ीन नहीं है.

क्या पारसमणी से कई मूर्तियों को सोने का बनाया गया? क्या तीमनगढ़ किले का खजाना पारसमणी की देन था? जानिए अंतिम अंक में...
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