बेवफा निकली बंदूक की गोली, कंधे के बजाय छाती में धंसकर ले गई जान

एक लड़के ने हमले की साज़िश तो ठीक रची थी लेकिन बस गलती उससे यह हुई कि उसने बंदूक से चलने वाली गोली और गोली चलाने वाले पर यकीन कर लिया. लखनऊ में हुए इस ब्लाइंड मर्डर की गुत्थी खुली तो कहानी ने हर सुनने वाले के होश उड़ा दिए.

Bhavesh Saxena | News18Hindi
Updated: August 20, 2018, 8:28 PM IST
बेवफा निकली बंदूक की गोली, कंधे के बजाय छाती में धंसकर ले गई जान
सांकेतिक चित्र
Bhavesh Saxena
Bhavesh Saxena | News18Hindi
Updated: August 20, 2018, 8:28 PM IST
तय तो यह हुआ था कि एक गोली चलेगी और मुश्किलों से निजात मिल जाएगी लेकिन प्लैन फेल हुआ तो एक गोली चली और एक जान चली गई. लखनऊ के एक लड़के ने अपनी मुश्किलों से निजात पाने के लिए एक जोखिम भरी स्कीम तैयार की. भाड़े के शूटर बुलाए और बंदूक, बाइक वगैरह सब इंतज़ाम किया और हमला भी तय जगह और वक्त पर हुआ, बस अंजाम वो नहीं हुआ जो सोचा था.

लखनऊ के आलमबाग इलाके में करण एक वैगन शॉप से बाहर निकलने से ऐन पहले आशीष से फोन पर बात कर रहा था. करण ने आशीष से पूछा कि सब कुछ प्लैन के हिसाब से चल रहा है तो आशीष ने अपनी घड़ी देखकर उसे दो मिनट बाद दुकान से निकलने को कहा. करण ने फोन काटा और वह घड़ी देखने लगा, उधर आशीष ने किसी को फोन कर कहा कि दो मिनट में करण दुकान से निकलेगा. दो मिनट होते ही करण एक बैग लेकर दुकान से निकला.

दुकान के सामने सड़क किनारे जैसे ही करण पहुंचा, कुछ ही दूरी से एक आदमी ने करण पर निशाना बांधा और अगले ही सेकंड एक गोली दाग दी. गोली सीधे करण की छाती में जाकर धंस गई और छाती खून उगलने लगी. करण अपनी छाती थामते हुए दर्द से कराह कर ज़मीन पर गिर पड़ा. गोली चलाने वाला आदमी अपने साथी के साथ करण के पास पहुंचा. उसने करण का बैग और उसकी जेब से कुछ सामान निकाला और दोनों वहां से भाग खड़े हुए. तड़प रहे करण ने दोनों को रोकने की कोशिश की लेकिन वह कुछ बोल तक नहीं सका.

कुछ ही देर में करण की सांस उखड़ चुकी थी और देखते ही देखते वहां लोग जमा होने लगे. लहूलुहान पड़े करण को देखकर भीड़ में से किसी ने पुलिस को फोन कर दिया और कुछ देर बाद पुलिस मौके पर पहुंची तो किसी को करण की इस हालत के बारे में कुछ खबर नहीं थी. आखिर यह सब अचानक हुआ कैसे? या यह अचानक नहीं था? यह कहानी कुछ महीने पहले शुरू हुई थी.

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24 साल का नौजवान करण कुछ ही वक्त से एक बिज़नेसमैन बना था. बिज़नेस शुरू और खड़ा करने के लिए करण ने मनी पूलिंग स्कीम बनाकर कई दूसरे व्यापारियों और व्यवसायियों से अच्छी खासी रकम उधार ली थी. तकरीबन 80 लाख का कर्ज़ा करण पर था और वह तय समय निकल जाने के बावजूद लेनदारों को उनकी रकम नहीं दे पा रहा था. कोई लेनदार तकाज़ा करता तो कोई उसे धमकी तक दे जाता. करण पर रकम वापस करने का बेहद दबाव बन चुका था.

कर्ज़ के बोझ से दब चुके करण ने अपनी उलझन और हालात के बारे में साथ काम करने वाले प्रियांशु उर्फ कल्लू से बातचीत की. करण को अंदाज़ा था कि कल्लू के पास इस मुश्किल से निकलने का कोई रास्ता ज़रूर होगा. कल्लू ने कुछ दिन सोचने के बाद करण को एक रास्ता बताया तो करण के होश उड़ गए. करण कैसे राज़ी हो सकता था -
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करण : तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है कल्लू, मेरी मुश्किल कम करने का प्लैन बता रहे हो या मुझे ही मरवाने का?
कल्लू : मानता हूं कि थोड़ा जोखिम ज़रूर है लेकिन अगर ज़रा हिम्मत से काम लो तो लंबे वक्त तक तुम्हें आराम हो सकता है.
करण : अरे यार, गोली का कोई धरम होता है क्या? कहीं और लग गई तो जान जाएगी मेरी. और फिर गोली चलाएगा कौन? तुम?
कल्लू : नहीं, उसके बारे में भी सोचा है मैंने. थोड़ा सा खर्चा होगा और पूरा सीन ऐसा लगेगा कि तुम पर हमला हुआ है.

अस्ल में, कल्लू की स्कीम यह थी कि पेशेवर शूटरों की मदद से करण पर एक हमले का नाटक करवाया जाए. करण पर एक गोली चले और हमलावर उसके पास से नोटों से भरा एक बैग लेकर भाग जाएं ताकि ऐसा लगे कि लूट के मकसद से उस पर हमला किया गया. इस खबर के बाद करण के लेनदार नरमी से पेश आएंगे और उसे कर्ज़ चुकाने का इंतज़ाम करने के लिए और वक्त मिल जाएगा. लेकिन इस काम में जोखिम था.

नाका हिंडोला पर करण का एक मोबाइल शोरूम था और कल्लू वहां का एक तरह से इंचार्ज था. करण के खास और भरोसेमंद कल्लू ने जब यह यकीन दिलाया कि सब कुछ प्लैन के मुताबिक होगा और ट्रेंड शूटर गोली मारेगा तो गोली केवल छूकर निकलेगी. कल्लू का प्लैन फुलप्रूफ था और किसी तरह कल्लू ने करण को राज़ी कर ही लिया. इस वक्त दोनों को नहीं पता था कि इस प्लैन में शामिल होने वाले लोगों के मंसूबे कुछ और हो सकते हैं और बंदूक से निकली गोली किसी की सगी नहीं होती. बहरहाल, प्लैन बनना शुरू हुआ.

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कल्लू ने अपनी जान पहचान के आशीष और अभिषेक के ज़रिये इस पूरे कांड को अंजाम देने की साज़िश रची. आशीष को करण से मिलवाया और बातचीत के दौरान आशीष ने खर्च के लिए रकम मांगी. करण ने आशीष को 40 हज़ार रुपये की रकम दी और शूटर से जल्द मिलवाने को कहा. आशीष ने 40 हज़ार की इस रकम से एक देसी पिस्तौल और एक दिन के लिए एक बाइक का इंतज़ाम करना शुरू किया.

एक-दो दिन बाद ही ट्रेंड पेशेवर शूटर अजय लोधी की मुलाकात करण और कल्लू से करवाई गई. अजय ने दोनों को भरोसा दिलाया कि उसका निशाना एकदम पक्का है, घबराने की कोई बात नहीं है, काम ठीक से हो जाएगा.

अजय : आप फिक्र मत करो करण भाई, सब ठीक हो जाएगा.
करण : फिक्र तो करना पड़ेगी भाई क्योंकि एकाध इंच भी इधर उधर लगी गोली तो मरूंगा तो मैं ही.
अजय : आप तो शक कर रहे हो. कल्लू भाई, बताओ इनको... करण भाई, छोटा मुंह बड़ी बात लेकिन आपका नाम करण है लेकिन आप निशाना नहीं लगा सकते. अपना नाम अर्जुन नहीं है लेकिन अपना निशाना उससे कम नहीं है..
करण : बात शक की नहीं है भाई, बस तसल्ली की है.

करण के कहने पर पूरी तसल्ली करने के लिए अजय के निशाने की जांच भी की गई और उसने एक सुनसान जगह पर अपना निशाना लगाकर दिखाया जिससे करण और कल्लू को यकीन हो गया कि वह इस काम के लिए ठीक है. इस काम के लिए दोनों ने अजय को डेढ़ लाख रुपये दिए और पूरा प्लैन समझा दिया. प्लैन रेडी था, आशीष और अभिषेक बाइक का इंतज़ाम कर अजय को स्पॉट पर ले जाएंगे. आशीष ने पिस्तौल का इंतज़ाम किया था और सबको आपस में बातचीत करने के लिए कल्लू ने मोबाइल फोन दे रखे थे.

पिछली 18 जून का दिन था और योजना के मुताबिक करण को एक दुकान से निकलना था. दुकान के बाहर आते ही अजय को गोली चलाना थी जो उसके कंधे को छूते हुए निकले और अजय व आशीष को करण का बैग लेकर भाग जाना था. ऐसा ही हुआ और करण दुकान के बाहर निकला, अजय ने गोली चलाई लेकिन कंधे के बजाय गोली लगी छाती में जो करण का काम तमाम कर गई. गोली लगने के बाद कुछ पल तक करण के दिमाग में इस साज़िश के दौरान अपना हर अंदेशा याद आ रहा था.

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'अगर गोली एकाध इंच भी इधर उधर लगी तो जान मेरी ही जाएगी.' 'देख भाई, निशाना ज़रा ठीक से लगाना, गोली कंधे के पास ही लगे वरना राम नाम सत्य हो जाएगा.' 'यार, क्या नकली पिस्तौल और नकली गोली का इस्तेमाल नहीं हो सकता?' 'ठीक है, अब मेरी जान तुम्हारे हाथ में है, मैंने तो ओखली में सिर डाल दिया है अब मूसल से क्या डरना..' आखिरकार करण का अंदेशा ठीक निकला था और अजय का निशाना चूक ही गया.

आशीष : अबे, ये क्या कर दिया साले? कंधे पर मारना थी ना गोली?
अजय : अरे यार, मैं क्या करूं, वो खुद ही इतना हिल डुल रहा था तो.
आशीष : बड़ा आया साला निशानेबाज़? चल अब निकल यहां से.. भाग बे...
अजय : रुक, रुक.. जोखिम अपन ने भी उठाया है, जो मिल रहा है, वो तो लपेट लें..

अजय और आशीष करण का बैग लेकर फरार हो गए. करण अपनी ही रची साज़िश में मर गया लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई. पुलिस के लिए करीब दो महीने पहले हुआ यह कत्ल एक ब्लाइंड मर्डर बन गया था. फिर करण के मोबाइल फोन के डिटेल्स निकाले गए तो आशीष और कल्लू के साथ लगातार उसकी बात होने से शक पैदा हुआ और पुलिस इन दोनों तक पहुंची. पूछताछ के बाद अजय और अभिषेक भी धरे गए और ये पूरी कहानी सामने आ गई. लेकिन इस कहानी में एक पेंच हो सकता है 'डबल क्रॉस' का!

अब सवाल यह है कि करण की योजना सुनने के बाद क्या अजय और आशीष के मन में यह नहीं आया कि इस नाटक को हकीकत में बदल दिया जाए. दोनों ने यह सोचा हो कि कंधे की जगह करण की छाती में गोली दागकर बड़ी रकम से भरा उसका बैग लेकर फरार हो जाया जाए. हालांकि दोनों जो बैग लेकर फरार हुए, उसमें बड़ी रकम नहीं निकली, करीब 8 हज़ार रुपये ही थे. बहरहाल, अब तक सामने आई इस कहानी में हर पेंच को लेकर पुलिस जांच चल रही है.

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