घर पर शॉर्ट स्‍कर्ट भी पहनना मना था, अब टू पीस पहनकर बॉडी दिखाती हूं

जिस घर में लड़की का शॉर्ट स्कर्ट पहनना, लड़कों से दोस्ती करना, तेज आवाज में बात करना और मर्दों की कुश्ती देखने तक जाना मना था, उस घर की लड़की आज टू पीस पहनकर हजारों मर्दों के सामने अपनी सिक्स पैक्स बॉडी दिखाती है. ये कहानी है इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ बॉडी बिल्डिंग में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली पहली भारतीय महिला बॉडी बिल्डर करुणा वाघमारे की.

Manisha Pandey
Updated: August 28, 2018, 3:15 PM IST
Manisha Pandey
Manisha Pandey
Updated: August 28, 2018, 3:15 PM IST
हमारे घर में पहलवानी की परंपरा रही है. पिता पहलवान थे और उनका पूरा परिवार, चाचा, ताऊ, भाई, काका भी. हमारे यहां मर्द दंगल संभालते थे और औरतें रसोई. पहलवान मर्दों का खाना बनाना, उनकी सेवा करना, औरतों का यही काम था. 29 जुलाई, 1976 को जब मेरा जन्म हुआ तो उससे पहले घर में चार लड़कियां और पैदा हो चुकी थीं. मैं पांचवी थी. बाप के खून में पहलवानी थी, उन्हें लगता था कि उनकी इस खानदानी परंपरा को आगे ले जाने वाला वारिस पैदा होगा. लेकिन हर बार ये होता कि लड़के के स्वागत की तैयारियां होतीं और हर बार एक और लड़की उनके अरमानों को रौंदती दुनिया में आ जाती.

लड़कियां बॉडी बिल्‍डर नहीं होतीं
हालांकि पिता को कभी नहीं लगा कि लड़का न सही तो लड़की ही सही. क्यों न उसे ही पहलवानी सिखाई जाए. हमारी सीमा रेखा तय थी. लड़की को घर की चारदीवारी में रहना है और बड़ी होकर नौकरी के नाम पर टीचर बनना है. मेरी चारों बहनें टीचर हैं. टीचर होने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन उस काम में आपकी खुशी तो होनी चाहिए. मुझसे किसी ने नहीं पूछा कि तुम्हारी खुशी किसमें है. हमारे घरों में लड़कियों से ये सवाल कभी नहीं पूछा जाता कि तुम्हारी खुशी किस चीज में है. मेरी मां से किसी ने नहीं पूछा, बहनों से नहीं पूछा. घर की किसी औरत से कभी ये नहीं पूछा गया. लेकिन जो किसी ने नहीं पूछा, वो मैंने खुद से पूछा और जवाब मेरे सामने था. मुझे बॉडी बिल्डिंग पसंद है. मैं छिप-छिपकर अपने मन का काम करती रही.

हमारे घर में लड़कियों को कुश्ती देखने जाने की इजाजत नहीं थी. एक बार गांव में कुश्ती हो रही थी तो मैं लड़कों के कपड़े पहनकर और अपने बालों को बड़ी सी पगड़ी में छिपाकर कुश्ती देखने चली गई. लेकिन मेरे चाचा ने मुझे पहचान लिया और पीटते हुए घर लेकर आए. उन्होंने जितना रोकना चाहा, मेरी जिद और बढ़ती गई. किसी ने उत्साह नहीं बढ़ाया लेकिन मैं रोज एक्सरसाइज करती रही. मां ने मेरे खाने की फिकर नहीं की, लेकिन मैंने की. हर वो बात जो मेरे लिए कोई और नहीं सोच रहा था, मैंने उस सबका जिम्मा खुद ले लिया.



फिटनेस की दुनिया में पहला कदम
बड़ी हुई तो काम की तलाश शुरू हुई. बहनों को टीचरी मिल गई थी, मुझे वो भी नहीं मिली. महाराष्ट्र में ऐसा है कि औरतें काम जरूर करती हैं. नौकरी न करें तो खेतों में काम करती हैं. मेरे पिता ने सारा जोर लगा दिया कि मुझे कहीं टीचर लगवा दें, लेकिन नौकरी मिली ही नहीं. यहां पिता मेरे लिए टीचरी ढूंढ रहे थे और मैं अपनी एप्लीकेशन लेकर मुंबई के जिमों के चक्कर लगा रही थी कि कहीं फिटनेस ट्रेनर की नौकरी मिल जाए. आखिर थाने के तलवलकर्स जिम में मुझे एरोबिक्स ट्रेनर की नौकरी मिल गई. यह 1996 की बात है.
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काफी समय तक तो घर पर बताया ही नहीं कि मुझे काम मिल गया है. जब उन्हें पता चला तो पिता यह सोचकर राजी हो गए कि है तो टीचरी ही. बस बच्चों को सिखाने के बजाय बड़ों को ऐराबिक्स सिखा रही है. ऐरोबिक्स ज्यादातर लड़कियां ही करती थीं तो ये भी चिंता नहीं रही कि मर्दों के बीच काम करेगी.

वहां से फिटनेस की दुनिया में मेरा सफर शुरू हुआ और फिर मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा. मैं अपने काम में अच्छी थी, मुझे एक के बाद एक जिम से ऑफर मिलते गए और अच्छे पैसे भी. मैंने ताज होटल के जिम में काम किया, होटल आइटीसी ग्रैंड सेंट्रल के जिम में बतौर एरोबिक्स ट्रेनर काम किया. मैं तीन शिफ्ट में काम करती, प्राइवेट ट्रेनिंग देती. मुझे पैसे कमाने थे. मुझे कुर्ला की उस चॉल से बाहर निकलना था, जहां मेरा जन्म हुआ था.



तंग गलियां, तंग घर, तंग दिमाग
तंग गलियों और तंग घरों में रहने वाले लोगों के दिमाग भी तंग हो जाते हैं. कुर्ला बहुत भीड़भाड़ वाला इलाका है. छोटी छोटी गलियां, मुर्गी के दड़बों जैसे घर, टॉयलेट के लिए लंबी लाइन, चारों तरफ गंदगी, कूड़ा, बारिश में कीचड़. मुंबई देखी है कभी आपने. एक तरफ झुग्गी बस्तियां और दूसरी तरफ ऊंची-ऊंची इमारतें. हमारी चॉल की डेढ़ फुट की खिड़की से बाहर झांको तो चारों ओर आसमान छूती बिल्डिंग नजर आती थीं. मैं इस चॉल से निकलकर उस बिल्डिंग में जाना चाहती थी. पता है, इस महानगर में एक आम आदमी का सपना क्या होता है. बस इतना ही कि किसी तरह वो चॉल से निकलकर दो कमरे के फ्लैट में चला जाए, कि आज लोकल ट्रेन में उसे विंडो सीट मिल जाए.

तब कोई इंटरनेशनल फेडरेशन मेरा सपना नहीं था. मेरा सपना बस इतना ही था कि कुर्ला की चॉल से निकल जाऊं, एक अदद घर हो, इंसानों वाला, साफ-सुंदर, जिसमें खुद का टॉयलेट हो, जिसकी खिड़की से हवा आती हो. बहुत मेहनत की, अपने पैसे कमाए और एैरोली में एक बेडरूम का एक फ्लैट खरीदा. एक लड़के से प्यार हो गया, उसी से शादी कर ली. सब सपने तो पूरे हो ही गए थे, अब क्या.



6 बच्‍चों और 6 पैक एब्‍स वाली औरत
मेरी बॉडी बिल्डिंग का सपना जिम तक सिमटकर रह गया था, लेकिन जिम सिर्फ दूसरों की क्यों हो, खुद की क्यों नहीं. मैंने तय किया, अब दूसरों की नहीं, खुद की नौकरी करूंगी. पैसे इकट्ठे किए और मरोल में खुद का एक जिम खोला. काम बढ़ता गया. फिर एक-एक करके विक्रोली, हीरानंदानी पवई और जुहू में भी अपना जिम खोल लिया. मरोल और चांदीवली में खुद के दो और फ्लैट खरीदे. अब पैसा भी था और अपने मन का काम भी.

और तभी ये हुआ कि मुझे लगा कि जो कर रही हूं, वो काफी नहीं. हमारे मरोल वाले जिम में एक लड़की आती थी, उसने काफी दुनिया घूमी थी. एक बार वो एक अमेरिकन मैगजीन ऑक्सीजन लेकर आई. उसके कवर पर एक औरत की फोटो थी और लिखा था – “मदर ऑफ सिक्स हैविंग सिक्स पैक्स.” ये फरवरी, 2009 की बात है. वहां से मेरी दूसरी यात्रा की शुरुआत हुई- बॉडी बिल्डिंग की शुरुआत. मुझे लगा कि जब छह बच्चों की मां सिक्स पैक्स बना सकती है तो मैं क्यों नहीं.



औरत को ट्रेनिंग कौन दे
शुरू में एक साल तो ट्रेनर ढूंढने में ही लग गए. कोई औरत को सिखाने के लिए तैयार ही नहीं था. लोग मेरा मजाक उड़ाते, ये क्या नया फितूर पाल लिया है. औरतें मसल्स बनाकर अच्छी नहीं लगतीं, ये मर्दों का काम है. औरतों के लिए कोई भी काम आसान नहीं होता, चाहे हवाई जहाज उड़ाना हो या मसल्स बनाना. वो कोई काम इसलिए नहीं कर लेती क्योंकि सब उसे सपोर्ट करते हैं, वो इसलिए करती है क्योंकि उसे जिद है.

मुझे भी जिद थी. आखिरकार कइदास कपाड़िया मुझे ट्रेनिंग देने को तैयार हो गए. ट्रेनिंग शुरू हुई, मसल्स, वेट लिफ्टिंग से लेकर न्यूट्रीशन तक. दो साल की कड़ी मेहनत के बाद नतीजे आने शुरू हो गए.

हिंदुस्‍तान की पहली महिला बॉडी बिल्‍डर
2011 में हैदराबाद में पहले कॉम्पटीशन में हिस्सा लिया और नेशनल चैंपियनशिप जीती. एशियन चैंपियनशिप में भाग लेने चीन हुई और चौथे तीसरे स्‍थान पर रही. थाइलैंड में हुई वर्ल्‍ड चैंपियनशिप में हिस्‍सा लिया और तीसरे स्‍थान पर रही. दो बार नेशनल चैंपियनशिप जीती. अब तक 30 से ज्‍यादा चैंपियनशिप में हिस्‍सा ले चुकी हूं.

मैं भारत की पहली औरत हूं, जिसने बॉडी बिल्डिंग में दुनिया के देशों में भारत का प्रतिनिधित्‍व किया. इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ बॉडी बिल्डिंग में अपने देश को रीप्रेजेंट करने वाली मैं पहली भारतीय महिला हूं. मर्द तो पहले भी बहुत थे, लेकिन औरत कोई नहीं.



मसल्‍स वाली औरत  
अब मैं सफल हूं तो लोग मेरी तारीफ करते हैं, पहले मजाक उड़ाते थे. मसल्‍स वाली औरत मतलब मर्दों जैसी औरत और मर्दों जैसी औरत किसी को अच्‍छी नहीं लगती. औरत को तो बचपन से ही सिखाया जाता है कि शरीर ही उसकी एकमात्र पूंजी है. इस शरीर को संभालो, इसे सजाओ, इसे छिपाओ. शरीर औरत का गहना है, उसकी लाज है. जिस लड़की को घर में शॉर्ट स्‍कर्ट पहनने की भी इजाजत नहीं थी, वह आज भरे मंच पर सिर्फ टू पीस में खड़ी है. जिस शरीर को हमेशा छिपाने के सबक सिखाए गए, उस शरीर को हजारों मर्दों के सामने दिखा रही है. आप कितनी भी मसल्‍स बना लें, आप मर्द तो नहीं हैं. देखने वाली मर्द निगाहें थोड़े आश्‍चर्य, थोड़ी जुगुप्‍सा से आपको ऐसे ही देखती हैं कि आप औरत हैं और आपका शरीर दिख रहा है. फिर वो आपको औरत मानने को भी तैयार नहीं क्‍योंकि औरत तो नाजुक होती है. मर्द अपनी सुविधा, अपनी जरूरत के हिसाब से आपको खांचों में फिट करते हैं, उन खांचों को तोड़कर अपना नया खांचा बनाना हमारी जिम्‍मेदारी है.

अब पिता को कोई शिकायत नहीं. वो खुश हैं कि जो काम उनके बेटा नहीं कर पाया, बेटी ने कर दिखाया. मैं पिछले 9 साल से लगातार बिना रुके, बिना थके नियम से वेट ट्रेनिंग कर रही हूं, सुबह डेढ़ घंटे कार्डियो और शाम को दो घंटे वेट ट्रेनिंग. कोई सपोर्ट, कोई स्‍पॉन्‍सरशिप नहीं है. मैंने अपने तीनों फ्लैट और गहने बेच दिए और सारा पैसा इस जुनून में लगा दिया.

मैं स्‍टेज पर बॉडी बिल्‍डर और घर में पत्‍नी हूं. घर के काम करती, अपने पति राहुल के लिए खाना बनाती, अपनी सास को डॉक्‍टर के पास लेकर जाती. एक सामान्‍य, घरेलू औरत. मसल्‍स बनाने का अर्थ ये नहीं कि अब मैं औरत नहीं रही.

मैं दोनों भूमिकाओं में खुश हूं. दोनों मिलकर मुझे पूरा करती हैं.

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