कैसे मनाते हैं कजरी तीज ? जानिए इसके पीछे प्रचलित मान्यता और कथा

मान्यता के अनुसार पार्वती ने भगवान शिव को पाने के लिए 107 जन्म लिए. मां पार्वती के कठोर तप और उनके 108वें जन्म में भगवान शिव ने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया, तभी से इस व्रत का आरंभ हुआ

News18Hindi
Updated: August 27, 2018, 7:23 AM IST
कैसे मनाते हैं कजरी तीज ? जानिए इसके पीछे प्रचलित मान्यता और कथा
प्रतीकात्मक तस्वीर
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Updated: August 27, 2018, 7:23 AM IST
कजरी तीज पर विवाहिताएं व्रत रखकर अपने पति की लंबी आयु के लिए माता पार्वती का आशीर्वाद प्राप्त करती हैं. इस दिन सुहागिन महिलाओं द्वारा मेहंदी रचाने और परिवार की बुजुर्ग महिलाओं से आशीर्वाद लेने की परंपरा है. इस साल की कजरी तीज 29 अगस्त को है.

इस तीज का नियम है क्रोध को मन में नहीं आने दें. इस दिन विवाहित महिलाओं को अपने मायके से आए वस्त्र ही धारण करने चाहिए, साथ ही श्रंगार में भी वहीं से आई वस्तुओं का प्रयोग करना चाहिए. माना जाता है कि जो कुंवारी कन्याएं इस व्रत को रखती हैं तो उनके व‌िवाह में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं.

इस दिन अपने होने वाली पति या पति की लंबी आयु के लिए निर्जला (बिना पानी के) व्रत रखें. व्रत के दौरान पूरे 16 श्रृंगार करके भगवान शिव और मां पार्वती की पूजा करें. हाथों में नई चूड़ियां, मेहंदी और पैरों में अल्ता लगाएं. जो स्त्रियां इस दिन व्रत रखती हैं, उन्हें भगवान शिव की पूजा करने के बाद ही व्रत खोलना चाहिए.

कजरी तीज की पूजा विधि

सबसे पहले महिलाएं किसी बगीचे या मंदिर में एकत्रित होकर मां पार्वती की प्रतिमा को रेशमी वस्त्र और गहने से सजाएं.
अर्धगोले का आकार बनाकर मां की मूर्ति बीच में रखें और मां की पूजा अर्चना करती हैं.
सभी महिलाओं में से एक महिला कथा सुनाती है, बाकी कथा को ध्यान से सुन, ध्यान करती हैं और पति की लंबी उम्र की कामना करती हैं.
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इस दिन सुहागिन महिलाएं अपनी सास के पांव छूकर उन्हें सुहागी देती हैं. सास न हो तो जेठानी या घर की बुजुर्ग महिला को देती हैं. इस दिन निम्न मंत्र का जाप करना अति फलदायक होता है.

मंत्र -
गण गौरी शंकरार्धांगि यथा त्वं शंकर प्रिया
मां कुरु कल्याणी कांत कांता सुदुर्लभाम

कजरी तीज: एक कहानी ये भी
अखा तीज, हरियाली तीज की तरह कजरी तीज भी सुहागिनों का पर्व है. हिंदू शादीशुदा महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए ये व्रत करती हैं. शादी की इच्छुक लड़कियां मनपसंद जीवनसाथी के लिए व्रत तथा पूजा करती हैं. हम आपके साथ बांट रहे हैं इसके नाम और इसकी प्रचलित कथा की जानकारी. अखा तीज, हरियाली तीज की तरह कजरी तीज भी सुहागिनों का पर्व है. हिंदू शादीशुदा महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए ये व्रत करती हैं. शादी की इच्छुक लड़कियां मनपसंद जीवनसाथी के लिए व्रत तथा पूजा करती हैं. हम आपके साथ बांट रहे हैं इसके नाम और इसकी प्रचलित कथा की जानकारी.

क्यों पड़ा कजरी तीज नाम, कजरी तीज
पौराणिक मान्यता के अनुसार देवी पार्वती ने शिव से विवाह के लिए कठिन तपस्या की. ये तप 108 सालों तक चला और शिव ने इसी दिन पार्वती को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकारा था. इसी दिन को कजरी तीज कहते और भगवान शिव की रजामंदी का उत्सव मनाते हैं.

तीज पर एक प्रचलित कथा
एक साहूकार के सात बेटे थे. सतुदी तीज के दिन उसकी बड़ी बहू नीम के पेड़ की पूजा कर रही थी कि तभी उसके पति का देहांत हो गया. इसी तरह से एक-एक करके साहूकार के 6 बेटे गुजर गए. फिर सातवें बेटे की शादी होती है तो साहूकार और उसकी पत्नी बहुत डरे हुए रहते हैं. तीज के दिन नई बहू कहती है कि वो नीम के पेड़ की जगह उसकी टहनी तोड़कर उसकी पूजा करेगी. उसके पूजा करने के दौरान ही मृत बेटे लौट आते हैं लेकिन वे किसी को दिखाई नहीं देते. बस नई बहू ही ये बात देख पाती है. वो तुरंत अपनी जेठानियों से चिल्लाकर कहती है कि वे आएं और साथ मिलकर पूजा करें. जेठानियां कहती हैं कि वे ऐसा कैसे कर सकती हैं, जबकि उनके पति नहीं रहे. तब वे सभी साथ आकर पूजा करती हैं और उनके पति सामने प्रकट हो जाते हैं. तभी से इस दिन नीम की टहनी की पूजा की जाने लगी ताकि पति की लंबी उम्र बनी रहे.

तीज की प्रचलित एक और कथा
पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक हरियाली तीज की व्रत कथा स्वंय शिवजी ने माता पार्वती को उनका पिछला जन्म याद दिलाने के लिए सुनाई थी. भगवान शिव ने मां पार्वती से कहा था कि हे पार्वती, कई वर्षों पहले तुमने मुझे पाने के लिए हिमालय पर्वत पर घोर तप किया था. कठिन हालात के बावजूद भी तुम अपने व्रत से नहीं डिगी और तुमने सूखे पत्ते खाकर अपना व्रत जारी रखा जो की आसान काम नहीं था. शिवजी ने पार्वतीजी को कहा कि जब तुम व्रत कर रही थी तो तुम्हारी हालात देखकर तुम्हारे पिता पर्वतराज बहुत दुखी थे, उसी दौरान उनसे मिलने नारद मुनि आए और कहा कि आपकी बेटी की पूजा देखकर भगवान विष्णु बहुत खुश हुए और उनसे विवाह करना चाहते हैं.

पर्वतराज ने नारद मुनि के इस प्रस्ताव को तुरंत स्वीकार कर लिया. लेकिन जब इस प्रस्ताव की जानकारी पार्वती को हुई तो पार्वती बहुत दुखी हुई क्योंकि पार्वती तो पहले ही शिवजी को अपना वर मान चुकी थीं.

मान्यताओं के अनुसार शिवजी ने पार्वती से कहा कि,'तुमने ये सारी बातें अपनी एक सहेली को बताई. सहेली ने पार्वती को घने जंगलों में छुपा दिया. इस बीच भी पार्वती,शिव की तपस्या करती रहीं.'

तृतीया तिथि यानि हरियाली तीज के दिन पार्वती रेत का शिवलिंग बनाया. पार्वती की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर ​शिवलिंग से शिवजी प्रकट हो गए और पार्वती को अपने लिए स्वीकार कर लिया.

कथानुसार,शिवजी ने कहा कि 'पार्वती,तुम्हारी घोर तपस्या से ही ये मिलन संभंव हो पाया. जो भी स्त्री श्रावण महिने में शुक्ल पक्ष की तृतीया को मेरी इसी श्रद्धा से तपस्या करेगी, मैं,उसे मनोवांछित फल प्रदान करूंगा.'

मान्यता के अनुसार पार्वती ने भगवान शिव को पाने के लिए 107 जन्म लिए. मां पार्वती के कठोर तप और उनके 108वें जन्म में भगवान शिव ने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया, तभी से इस व्रत का आरंभ हुआ. देवी पार्वती ने भी इस दिन के लिए वचन दिया कि जो भी महिला अपने पति के नाम पर इस दिन व्रत रखेगी, वह उसके पति को लंबी आयु और स्वस्थ जीवन का आशीर्वाद प्रदान करेंगी.

भविष्यपुराण में उल्लेख किया गया है कि तृतीय के व्रत और पूजन से सुहागन स्त्रियों का सौभाग्य बढ़ता है और कुंवारी कन्याओं के विवाह का योग प्रबल होकर मनोनुकूल वर प्राप्त होता है.

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