#PGStory: वो रूममेट हर दिन ज़रूरत से ज्यादा नाश्ता भरकर ले जाती थी

हम सभी अलग-अलग शहरों, परिवारों से नौकरी करने इस शहर में रह रहे थे. जिसमें हर काम में हर एक का योगदान जरूरी था. लेकिन वो कभी कुछ नहीं करती थी.

News18Hindi
Updated: August 29, 2018, 10:49 AM IST
#PGStory: वो रूममेट हर दिन ज़रूरत से ज्यादा नाश्ता भरकर ले जाती थी
प्रतीकात्मक तस्वीर
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Updated: August 29, 2018, 10:49 AM IST
(News18 हिन्दी की सीरीज़ 'पीजी स्‍टोरी' की ये 71वीं कहानी है. इस सीरीज में पीजी में रहने वाली उन लड़कियों और लड़कों के तजुर्बों को सिलसिलेवार साझा किया जा रहा है, जो अपने घर, गांव, कस्‍बे और छोटे शहर से निकलकर महानगरों में पढ़ने, अपना जीवन बनाने आए. हममें से ज़्यादातर साथी अपने शहर से दूर, कभी न कभी पीजी में रहे या रह रहे हैं. मुमकिन है, इन कहानियों में आपको अपनी जिंदगी की भी झलक मिले. आपके पास भी कोई कहानी है तो हमें इस पते पर ईमेल करें- ask.life@nw18.com. आपकी कहानी को इस सीरीज में जगह देंगे.

ये कहानी एक लड़की की है, जो नौकरी के चलते नए शहर आकर रहती है. उसे वहां अजीब नेचर की रूममेट का सामना करना पड़ता है. वो न घर के किसी काम में हाथ बंटाती है, और न ही किसी और काम में सहयोग देती है. )

नोएडा के फ्लैट में नए नए शिफ्ट हुए थे. 3 BHK फ्लैट में चार लड़कियां थी. एक कमरे में एक लड़की और दो में तीनों लड़कियों का सामान था. कोई कहीं भी, कुछ भी रख लेता. मनीषा सिर्फ कमरे में अकेले नहीं रहती थी. वो सभी से कटी-कटी भी रहती. दो कमरों का एक कॉमन वॉशरूम था. जिसे मनीषा कभी साफ नहीं करती थी. न कभी डस्टबिन का कूढ़ा फेंकती और न किचन साफ करती.

हम सभी अलग-अलग शहरों, परिवारों से नौकरी करने इस शहर में रह रहे थे. जिसमें हर काम में हर एक का योगदान जरूरी था. लेकिन वो कभी कुछ नहीं करती थी. बाथरूम से अपने गंदे कपड़े तक हफ्तों-हफ्तों में उठाती थी. राशन सभी मिलकर मंगाते हैं, क्योंकि खाना बनाने वाली आंटी कॉमन थी. नाश्ते का सामान भी सब मिलकर ही मंगाते थे. लेकिन मनीषा उसमें भी जरूरत से ज्यादा चालाक बनती थी.



वो न सिर्फ अपने लिए नाश्ता बनाती/बनवाती बल्कि हर दिन अपने दोस्तों के लिए भी ले जाती. रोज़ाना 200-250 ग्राम के करीब स्प्राउट्स भरकर ले जाती. शुरुआत में तो हम तीनों ने कुछ नहीं कहा. लेकिन जब हम अगले महीने के राशन का टोटल करने बैठे तो वो करीब 10 हजार बना. और अमाउंट सिर्फ दाल-आटे का था. हमने इस बारे में उससे जिक्र किया तो वो चिढ़ गई.

हमने उससे कहा, उसे हर दिन इतने स्प्राउट्स लेकर जाने हैं तो अपने लिए अलग ले आए. एक दफा तो वो लाई लेकिन फिर जल्द ही उसे भी अहसास हुआ कि वो खाने का बड़ा हिस्सा, बाहर वालों के लिए ले जाती है. एक बार के बाद फिर उसने ज्यादा नाश्ता ले जाना बंद कर दिया. लेकिन इसके बाद वो जैसे हमसे बदला लेने पर उतारू हो गई. रसोई के बर्तन छिपाने लगी. हमने परेशान होकर काम वाली आंटी से पूछा तो वो नाराज़ हो गईं. उन्हें भी इस बारे में कुछ नहीं पता था.
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एक रोज दूसरी रूम मेट ने उसके कमरे में देखा, सारे बर्तन वहीं रखे हुए थे. उसने सारे सामान की वीडियो बनाई और व्हाट्सऐप ग्रुप में भेज दी. हमने उससे जवाब मांगा तो वो बोली, वो सब मैं घर भेज दूंगी. क्योंकि वो मेरे बर्तन थे. इसके बाद उसका हर बात-बात में तेरा-मेरा करना दिन पर दिन बढ़ता गया और एक सुबह तो उसने हद ही कर दी.

काम वाली आंटी से कुकर से हमारी सब्जी पलटवादी. फिर हम भी जैसे को तैसा वाली निती पर आ गए. हमने अपनी फ्रिज में उसका सामान रखने से मना कर दिया. इसके बाद उसे लगा अब हम उसपर भारी पड़ रह हैं तो उसके लहजे में नर्मी आनी शुरू हुई. और गाड़ी अब तक ऐसे ही घिसट रही है.

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