#PGStory: वो ऑटो वाला, दिन-रात, हर मौसम में मुझे सुरक्षित घर ड्रॉप करता है

घर से मेट्रो स्टेशन जाने के दौरान कई दिन तक एक ही ऑटो वाला मिला.

News18Hindi
Updated: August 27, 2018, 8:13 AM IST
#PGStory: वो ऑटो वाला, दिन-रात, हर मौसम में मुझे सुरक्षित घर ड्रॉप करता है
प्रतीकात्मक तस्वीर
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Updated: August 27, 2018, 8:13 AM IST
(News18 हिन्दी की सीरीज़ 'पीजी स्‍टोरी' की ये 69वीं कहानी है. इस सीरीज में पीजी में रहने वाली उन लड़कियों और लड़कों के तजुर्बों को सिलसिलेवार साझा किया जा रहा है, जो अपने घर, गांव, कस्‍बे और छोटे शहर से निकलकर महानगरों में पढ़ने, अपना जीवन बनाने आए. हममें से ज़्यादातर साथी अपने शहर से दूर, कभी न कभी पीजी में रहे या रह रहे हैं. मुमकिन है, इन कहानियों में आपको अपनी जिंदगी की भी झलक मिले. आपके पास भी कोई कहानी है तो हमें इस पते पर ईमेल करें- ask.life@nw18.com. आपकी कहानी को इस सीरीज में जगह देंगे.

ये कहानी एक लड़की की है, जो नौकरी के चलते जयपुर से दिल्ली शिफ्ट हुई. शहर और यहां के लोग, दोनों ही उसके लिए अंजान थे. लेकिन इस दौरान उसकी दुआ-सलाम एक ऑटो वाले से हुई, जो उसे हर दिन, हर समय, हर मौसम में सुरक्षित घर ड्रॉप करता है.)

2016 में जयपुर से गुड़गांव शिफ्ट हुई. ये पहली बार था जब घर से दूर थी. मैं मिजाज़न कम ही लोगों से बात करती थी. मेरे करीबी बहुत कम, लेकिन मज़बूत रिश्ते हैं.

गुड़गांव के उस फ्लैट में हम चार लड़कियां थी, सभी नौकरी वाली. घर से दफ्तर, दफ्तर से घर. यही ज़िंदगी थी. घर से मेट्रो और फिर मेट्रो से दफ्तर. घर से मेट्रो तक के सफर में हर दिन नए-नए लोग मिलते. कोई 2-4 दिन लगातार मिल जाए तो जानी-पहचानी सी मुस्कान दे देता/देती.

घर से मेट्रो स्टेशन जाने के दौरान कई दिन तक एक ही ऑटो वाला मिला. उससे जान-पहचान सी हुई. दुआ-सलाम बढ़ती गई. कामकाज से लेकर पारिवारिक ज़िम्मेदारियों की बातें शेयर करने लगे. मैं अपने लिए जो नाश्ता ले जाती, उसके लिए भी थोड़ा अलग पैक करा लेती.



धीरे धीरे पता चला वो यंग सा दिखने वाला लड़का अपनी उम्र से बड़ी बातें क्यों करता है. घर की ज़िम्मेदारी उसर के कमसिन कांधो पर भारी पड़ रही थी.
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मैं, खुद दूसरे शहर में करियर की पहली नौकरी कर रही थी, लेकिन उसकी मदद करना चाह रही थी. खुद्दार तो वो था. इसलिए मैंने ठाना कि ज्यादा तो नहीं. पर रोज सुबह-शाम उसी के ऑटो से आना जाना कर के, उसके सवारी ढूंढने में जाया होने वाले वक्त को बचा दूंगी. हर सुबह उसी के ऑटो से जाती और रात को उसी के साथ लौटती. गर्मी, सर्दी का मौसम हो या बरसात का. अब मैं कैब की बजाय उसी के साथ जाती हूं.

कभी भी लेट नाइट बाहर जाएं, घर तक पहुंचने से बे-फिक्र रहते हैं. तेज बारिश में वो खुद फोन करके पूछता है. दीदी, ड्रॉप करना है तो बता दो. धीरे-धीरे उसकी जान-पहचान मेरी बाकी फ्लैटनेट साथियों से भी हुई. थोड़े वक्त बाद घर के आसपास कहीं भी, कभी भी जाना हो हम बे-झिझक भय्या को कॉल करते हैं और वो हाजिर हो जाते हैं. मैं अपने बर्थडे के दिन भी कैब की बजाय ऑटो से ही गई. दोस्तों के साथ साथ भय्या को भी पार्टी दी. और पार्टी के बाद उनके बच्चों के लिए मिठाई भी पैक कराई.

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