#PGStory: रूममेट के रिश्तेदार कमरे में ऐसे आ बसे कि जा नहीं रहे थे, पर मैंने टरकाया

पहले दिन तो मैंने उनसे दुआ-सलाम किया था, लेकिन फिर बातचीत नहीं की. वे समझ गए थे, मैं उन्हें पसंद नहीं करता.

News18Hindi
Updated: August 26, 2018, 9:05 AM IST
#PGStory: रूममेट के रिश्तेदार कमरे में ऐसे आ बसे कि जा नहीं रहे थे, पर मैंने टरकाया
प्रतीकात्मक तस्वीर
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Updated: August 26, 2018, 9:05 AM IST
(News18 हिन्दी की सीरीज़ 'पीजी स्‍टोरी' की ये 68वीं कहानी है. इस सीरीज में पीजी में रहने वाली उन लड़कियों और लड़कों के तजुर्बों को सिलसिलेवार साझा किया जा रहा है, जो अपने घर, गांव, कस्‍बे और छोटे शहर से निकलकर महानगरों में पढ़ने, अपना जीवन बनाने आए. हममें से ज़्यादातर साथी अपने शहर से दूर, कभी न कभी पीजी में रहे या रह रहे हैं. मुमकिन है, इन कहानियों में आपको अपनी जिंदगी की भी झलक मिले. आपके पास भी कोई कहानी है तो हमें इस पते पर ईमेल करें- ask.life@nw18.com. आपकी कहानी को इस सीरीज में जगह देंगे.

ये कहानी एक लड़के की है, जो पढ़ाई के लिए दिल्ली आया. 2 बीएचके फ्लैटस में अपने कॉलेज के ही क्लासमेट्स के साथ रहा. एक दफा एक फ्लैटमेट के रिश्तेदार वहां आए और फिर जाने का नाम ही नहीं लिया. लेकिन उस लड़के ने उन्हें भेजकर ही दम लिया.)

बिहार के बेगुसराय से स्कूलिंग के बाद लगभग 3 साल पटना में रहा और आगे की पढ़ाई के लिए दिल्ली आया. 'अतिथि तुम कब जाओगे' फिल्म तो 2010 में आई. मैं वो सिचुएशन फिल्म आने से पहले ही झेल चुका था. 'मेहमानों का आदर करो' वाले संस्कार बचपन से कूट कूटकर भरे गए थे. पर महानगर की स्थिति उनके ठीक उलट थी. मैं वसंत कुंज के पास किसनगढ़ में 2 बीएचके में दो और दोस्तों के साथ रह रहा था.

एक शाम घर पहुंचा. वहां 5-6 उम्र दराज लोग थे. मैं चौंका. फिर लगा दूसरे रूममेट्स के जानने वाले होंगे. दूसरा आया वो भी चौंका. वो भी उन्हें नहीं जानता था. तीसरा देर से आया, पता चला वो उसके जानने वाले हैं. शाम होने तक वहां तीन लोग बचे थे. वे वहीं सोने वाले थे. वो रात तो जैसे-तैसे काट ली.



अगली सुबह मैं एक दोस्त के यहां रहने चला गया. क्योंकि वे तीन दिन के लिए वहीं ठहरने वाले थे. सर्दी के दिन थे. अपने कपड़े लेने वापस आया तो देख कमरा अस्त-व्यस्त था. तीसरे दिन भी वे नहीं गए. हर सामान चेक किया गया था. मेरी सहनशीलता बढ़ रही थी. लेकिन कोई हल नहीं था. मैं उन्हें कमरे से निकालने की फिराक में था. ताकि कमरे की सफाई हो जाए. पूछा, दिल्ली घूमना है तो बताइए.

पहले दिन तो मैंने उनसे दुआ-सलाम किया था, लेकिन फिर बातचीत नहीं की. वे समझ गए थे, मैं उन्हें पसंद नहीं करता. जिस रूममेट के रिश्तेदार थे, उससे पूछा उन्हें पूछा कोई परेशानी है तो बताओ. हम मदद कर देंगे.
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रूममेट भी झेंपने लगा था, उससे पूछा. बात क्या है. पूछा हम कोई सहयोग कर सकते हैं क्या. उन्हें यहीं रहना है तो हम अपने लिए कमरा ढूंढ लेंगे. उसने बताया वो भी फंस गया है. पता चला वो लोग उस लड़के का मुआयना करने आए थे. यानी लड़का देखने. इससे पहले बताया था, एक नेता के साथ रैली में आए थे. तो यहां रुक गए. मुझे लग रहा था, ज़रूर दाल में कुछ काला है.

मैंने एक और दोस्त के रूम पर पार्टी का इंतज़ाम किया. उन्हें ले गया. ड्रिंक सर्व की. जिसे देखने आए थे, उस लड़के की बुराई की. धीरे धीरे पता चला, उन्होंने किसी से पैसा लिया था. उससे छिपकर यहां बैठे थे. मैंने उन्हें डराया, आपकी बात यहां फैल जाएगी, सब स्टूडेंट्स हैं. उन्हें हरिद्वार के सस्ते जीविकोपार्जन के बारे में बताया. अगले दिन बस में बैठाने तक, उनके साथ ही रहा.

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