OPINION: इरादों के पक्के हैं इमरान, फिर भी बड़ी चुनौती है नया पाकिस्तान

इमरान खान को न सिर्फ यह साबित करना होगा कि वो फौज की कठपुतली नहीं हैं, बल्कि अपनी फौज और आईएसआई के सोच के पुराने ढर्रे को भी बदलना होगा...

फर्स्टपोस्ट.कॉम
Updated: August 29, 2018, 11:59 AM IST
OPINION: इरादों के पक्के हैं इमरान, फिर भी बड़ी चुनौती है नया पाकिस्तान
इमरान खान को न सिर्फ यह साबित करना होगा कि वो फौज की कठपुतली नहीं हैं, बल्कि अपनी फौज और आईएसआई के सोच के पुराने ढर्रे को भी बदलना होगा...
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Updated: August 29, 2018, 11:59 AM IST
यूसुफ अंसारी
प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद इमरान खान नया पाकिस्तान बनाने की मुहिम में जुट गए लगते हैं. शुरुआत में ही इमरान खान ने वीआईपी कल्चर को पूरी तरह खत्म करने के लिए कई कड़े फैसले करके यह बता दिया है कि वो अपने इरादे और वादे के पक्के हैं. यह अलग बात है कि इमरान पर वादाखिलाफी के आरोप लगाते हुए पाकिस्ताने के कब्जे वाले कश्मीर में उनकी जबरदस्त मुखालफत शुरू हो गई है.

इमरान खान की सरकार ने देश से वीआईपी कल्चर खत्म करने के सबसे पहले नेताओं और अफसरों की फिजूलखर्ची पर लगाम लगाई. प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति तक के फर्स्ट क्लास हवाई सफर पर पाबंदी लगा दी है. और अब इसी कड़ी में देशभर के एयरपोर्ट पर रसूखदार लोगों को दिए जाने वाले वीआईपी प्रोटोकॉल पर भी पांबदी लगा दी है.

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सूचना मंत्री फवाद चौधरी ने इसकी जानकारी देते हुए कहा है, ‘हमने सभी यात्रियों को बगैर बिना भेदभाव के सबके साथ एक जैसा बर्ताव करने और एक जैसी सुविधाएं देने की योजना को कड़ाई से लागू करने का फैसला किया है.’ संघीय जांच एजेंसी एफआईए के किसी भी कर्मचारी को किसी को भी वीआईपी सुविधा देते हुए पकड़े जाने पर उस शिफ्ट के इंचार्ज को तुरंत संस्पेंड किए जाने के सख्त निर्देश दे दिए गए हैं.

पाकिस्तान के चुनावी नतीजों में बढ़त मिलने के बाद अपनी पहली ही प्रेस कांफ्रेस में इमरान खान ने वीआईपी कल्चर को खत्म करन का ऐलान किया था. उन्होंने आलीशान प्रधानमंत्री निवास में रहने के बजाय छोटे मकान में रहने, सिर्फ दो गाड़ियां और दो सेवक लेने का ऐलान किया था. उन्होंने पीएम हाउस का इस्तेमाल शिक्षण संस्थान के रूप मे करने और राज्यों के राजभवनों का हैरिटेज होटलों के रूप में करने का ऐलान किया था. इमरान ने पाकिस्तान को मदीना की तर्ज पर ऐसा 'कल्याणकारी राज्य' की बनाने की बात की थी जहां विधवाओं, यतीमों और समाज के निचले तबके की बुनियादी जरूरते पूरी करने की जिम्मदारी सरकार की हो.

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तब इमरान ने कहा था, 'मेरी प्रेरणा आखिरी पैगंबर मुहम्मद से आती है जिन्होंने मदीना में एक आदर्श कल्याणकारी राज्य स्थापित किया था. मैं चाहता हूं कि पाकिस्तान ऐसा ही बन जाए.'

इमरान के इन विचारों कि वजह से भारतीय मीडिया में उन्हें पाकिस्तान का केजरीवाल कहा गया. केजरीवाल ने दिल्ली में चुनावों से पहले वीआईपी कल्चर पूरी तरह खत्म करने, मुख्यमंत्री बनने पर बड़ी गाड़ी, बड़ा बंग्ला और सुरक्षा नहीं लेने का वादा किया था. लेकिन मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने इस वादे को निभाया नहीं. केजरीवाल समेत उनके सभी मंत्रियों ने बंग्ले भी लिए और बड़ी गाड़ी भी.

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हां, सुरक्षा का वैसा तामझाम उनके साथ नहीं दिखता जैसे पहले की सरकार में दिखता था. इमरान को जो बात केजरीवाल से एकदम अलग करती है वो यह है कि इमरान ने वीआईपी कल्चर को चुनावी मुद्दा नहीं बनाया था. चुनाव जीतने के बाद उन्होंने इसके खत्म करने का ऐलान किया और प्रधानमंत्री बनते ही इस पर कड़े फैसले कर डाले.

इमरान खान अपने इरादों के पक्के हैं. यह बात उन्होंने कई बार साबित की है. 1987 में भारत में हुए क्रिकेट के विश्व कप में सेमीफाइनल में हारने के बाद पाकिस्तान जाकर इमरान ने कप्तानी से इस्तीफा दे दिया था और क्रिकेट से सन्यास का ऐलान कर दिया था. कुछ अरसे बाद पाकिस्तान ते तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल जियाउल हक ने उन्हें बुलाकर अगले वर्ल्ड कप तक क्रिकेट टीम की कमान संभालने को कहा. इमरान ने तभी उनसे वादा किया कि वो अगला वर्ल्ड कप जीत कर उन्हें तोहफा देंगे. 1992 का क्रिकेट वर्ल्ड कप जीत कर इमरान ने अपना वादा पूरा कर दिखाया. उसके बाद उन्होंने अपनी मां को कैंसर होने पर पाकिस्तान लोगों से चंदा मांग कर कैंसर अस्पताल बनवाया. उनके इस अस्पताल में गरीबों का मुफ्त इलाज होता है. इसी तरह उन्होंने गरीब बच्चों को अच्छी तालीम देने के इरादे से एक विश्वविद्यालय भी जनता से चंदा इकट्ठा करके बनवाया है.

1996 में जब इमरान खान ने पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी बनाकर राजनीति में कदम में रखा तब लोगों ने उनकी मजाक उड़ाया था. अपनी पार्टी बनाकर राजनीति मे कूदने का सीधा मतलब था कि वह मौजूदा पार्टियों में से किसी का पिछलग्गू बनने के बजाय खुद देश की बागडोर संभालने का सपना देख रहे हैं. तब लोगों ने इसे दीवाने का ख्वाब करार देकर उनका हौसला तोड़ने की कोशिश की थी. लेकिन 22 साल के लंबे संघर्ष के बाद इमरान ने अपना सपना पूरा करके अपने आलोचकों का मुंह बंद कर दिया. साथ ही यह भी बता दिया कि उन्हें न कोई डिगा सकता है और न ही कोई उन्हें अपना मकसद हासिल करने से रोक सकता है. बतौर क्रिकेटर और बतौर राजनीतिज्ञ अब तक के उनके कैरियर पर नजर डालने से एक बात साफ हो जाती है कि बड़े फायदे के लिए इमरान बड़ा जोखिम उठाने का रिस्क लेने का तैयार रहते हैं.

बतौर प्रधानमंत्री खुद को साबित करने के लिए इमरान खान के पास बड़ा और बेहतरीन मौका है. भले ही उनकी सरकार गठबंधन की है लेकिन उन्हें सहयोगियों से कोई बड़ी चुनौती मिलने की संभावनाएं कम हैं. इसका पहला कारण तो यह है कि इमरान ने अपनी सरकार का मूल उद्देश्य सामने रखा है ‘कल्याणकारी राज्य’ की स्थापना. इससे पाकिस्तान के किसी भी राजनीतिक दल की असहमति नहीं हो सकती.

दूसरा यह कि वहीं की मौजूदा नेशनल असंबली में किसी और वैकल्पिक सरकार की संभावना नहीं है. तीसरी बात यह है कि घरेलू मोर्चे के साथ ही इमरान कश्मीर और बाकी विदेश नीति पर एक ऐसी संतुलित नीति बनाकर चलने की कोशिश कर रहे हैं जिस पर पाकिस्तान में लगभग आम राय है. ऐसे में कोई दल उनकी सरकार गिरा कर मध्यावधि चुनाव का ठीकरा खुद अपने सिर फोड़वाना नहीं चाहेगा.

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प्रधानमंत्री बनने से पहले से इमरान खान पर फौज की कठपुतली होने के आरोप लग रहे हैं. इन आरोपों की वजह पाकिस्तानी सियासत का पुराना रिकॉर्ड है. पाकिस्तान की ज़्यादातर सरकारें वहां की फौज और आईएसई की कठपुतली ही रहीं हैं. जिस सरकार ने इनकी मर्ज़ी के खिलाफ़ जाने कोशिश की है उसी का तख्ता पलट हुआ है.



जुल्फिकार अली भुट्टो से लेकर नवाज शरीफ तक इसके उदाहरण हैं. इन हालात से निपटना इमरान के लिए सचमुच बड़ी चुनौती है. इमरान को भी शायद इसका एहसास है. इसीलिए वो भारत के साथ रिश्तों और कश्मीर मुद्दे पर फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं. अपनी पहली प्रेस कांफ्रेस में ही उन्होंने कश्मीर को कोर मुद्दा बताकर पाकिस्तानी अवाम, फौज और आईएसआई को खुश कर दिया. वहीं भारत से रिश्ते सुधारने के बारे में उन्होंने भारत के दो कदम आगे बढ़ने पर चार कदम बढ़ने का बात कहकर साफ कर दिया पहल भारत को करनी होगी.

इमरान खान सरकार की प्राथमिकता सूची को देखकर ऐसा लगता है कि वो पहले घरेलू मोर्चे पर खुद को साबित करके उन्हें अधूरा जनादेश देने वली पाकिस्तानी अवाम का दिल जीतना चाहते हैं. ‘कल्याणकारी राज्य’ की स्थापना की तरफ दो चार कदम बढ़ाने के बाद ही वो कश्मीर और भारत से रिश्ते सुधारने पर ध्यान देंगे. हालांकि अभी पाकिस्तान से खबर आ रही है कि वहां की इमरान खान की सरकार एक ऐसे प्रस्ताव पर काम कर रही है जिससे कश्मीर मसला सुलझ सकता है.

उनके मंत्रिमंडल के एक शीर्ष मंत्री ने एक स्थानीय न्यूज चैनल से बातचीत के दौरान इस बात का खुलासा किया है. पाकिस्तान के मानवाधिकार मंत्री शिरीन मजारी ने उम्मीद जताई कि उनके प्रस्ताव का यह मसौदा अगले हफ्ते के आखिर तक आ जाएगा. मसौदा तैयार होने को बाद इस पर सरकार में शामिल दलों और नेताओं से सलाह मशविरा किया जाएगा.



गौरतलब है कि इमरान खान की सरकार कश्मीर मुद्दे पर प्रस्ताव ऐसे समय पर लेकर आ रही है जब दुनिया के सामने यह साबित हो गया है कि पाकिस्तान की धरती से आतंकवाद संचालित होता है. इसका सीधा असर प्रभाव भारत और अफगानिस्तान पर पड़ता है. इससे यह भी साबित हो गया है कि इमरान खान कश्मीर पर जो भी फैसले करेंगे वो अपने वहां के राजनीतिक दलों की आमराय से करेंगे.

इस प्रस्ताव के सामने आने के बाद ही इस पर वहां का फौज और आईएसआई का रुख पता चलेगा. फिलहाल तो यही कहा जा सकता है कि इन सबके बीच संतुलन बनाना इमरान खान के लिए क्रिकेट के मैदान पर बल्लेबाज टीम को ज्यादा रन बनाने से रोकने के लिए फील्डिंग सजाने और खुद बल्लेबाजी करते वक्त एक-एक रन चुराने की रणनीति बनाने से ज्यादा मुश्किल चुनौती है.

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एक बात जो इमरान खान के पक्ष में जाती है वो है उनकी सकारात्मक सोच और लक्ष्य हासिल करने की रणनीति बनाकर उसे हासिल करने लिए लगातार संघर्ष करने की उनकी क्षमता. अगर 22 साल पहले इमरान खान ने पाकिस्तान की सत्ता की बागडोर संभालने का सपना देखा था तो निश्चित तौर पर उनके जेहन में पाकिस्तान को आगे ले जाने का रोडमैप भी होगा.

इसकी झलक उन्होंने अपनी पहली ही प्रेस कांफ्रेस में दिखाई थी. भारत में उनके चाहने वाले भी कम नहीं हैं. उन्हें भारत आने का खूब मौक़ा भी मिला है. वो शायद पाकिस्तान के ऐसे पहले प्रधानमंत्री है जिन्हें कुर्सी पर बैठने से पहले भारत आकर यहां के लोगों से मिलकर उनके जज्बात समझने का मौका मिला है.

अपने इन्हीं अनुभवों के आधार पर अगर वो कश्मीर समस्या के समाधान और भारत-पाक दोस्ती का कोई खाका तैयार करेंगे तो निश्चित तौर पर उसमें उन्हें कामयाबी मिलेगी. इसके लिए पहले उन्हें अपने घरेलू मोर्चे पर बड़ी लड़ाई लड़नी होगी. उन्हें न सिर्फ यह साबित करना होगा कि वो फौज की कठपुतली नहीं हैं बल्कि अपनी फौज और आईएसआई के सोच के पुराने ढर्रे को भी बदलना होगा. ऐसा किए बिना नए पाकिस्तान की कल्पना करना बेमानी होगा. यही उनके सामने बड़ी चुनौती है.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)
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